भारत में हर वेतनभोगी साल की शुरुआत में एक फ़ॉर्म भरता है — वह फ़ॉर्म जिसमें आप अपने नियोक्ता को बताते हैं कि आप कौन-कौन सी कटौतियाँ लेने वाले हैं, ताकि वे आपका TDS निकाल सकें। दस साल से वह फ़ॉर्म 12BB (12बीबी) था। अब वह नहीं है।
आयकर नियम, 2026 के तहत यह घोषणा अब फ़ॉर्म 124 है, जो आयकर अधिनियम, 2025 की धारा 392(5)(b) के साथ नियम 205 के अंतर्गत आता है। पुराना फ़ॉर्म धारा 192 और नियम 26C के तहत था, और ये दोनों 1961 के अधिनियम के साथ ही चले गए।
असल में बदला क्या
प्रयोजन वही है। आप अब भी मकान किराया, गृह ऋण का ब्याज, धारा 80C के निवेश वग़ैरह लिखते हैं, और अब भी प्रमाण लगाते हैं। तीन चीज़ें अलग हैं:
- नंबर और क़ानूनी आधार। फ़ॉर्म 124, न कि 12BB। धारा 392(5)(b) और नियम 205, न कि 192 और 26C।
- शब्दावली। अधिनियम अब “कर वर्ष” कहता है। “निर्धारण वर्ष” ख़त्म हो गया।
- मकान मालिक को लेकर एक नया सवाल। HRA का दावा कर रहे हैं तो बताना होगा कि मकान मालिक से आपका क्या रिश्ता है, अगर कोई है।
ध्यान देने लायक़ बदलाव यही आख़िरी वाला है।
मकान मालिक वाला सवाल
माता-पिता को किराया देकर HRA का दावा करना क़ानूनी है, और हमेशा रहा है। यह वही व्यवस्था भी है जो काग़ज़ पर सबसे ज़्यादा दिखती है और हक़ीक़त में सबसे कम।
रिश्ता बताने से दावा नामंज़ूर नहीं हो जाता। बस वह दिखने लगता है। अगर व्यवस्था सचमुच की है तो आपके लिए कुछ नहीं बदलता:
- सम्पत्ति वाक़ई उनके नाम होनी चाहिए, आपके नाम नहीं
- किराया वाक़ई आपके खाते से जाना चाहिए — नक़द नहीं, बैंक ट्रांसफ़र या UPI से
- उन्हें अपने रिटर्न में उसे आय दिखाना होगा
अगर यह व्यवस्था सिर्फ़ रसीद बुक में है, तो अब उसे पकड़ना कहीं आसान है, और उसे कर-नियोजन नहीं, कर-चोरी माना जाता है।
साथ ही PAN की सीमा भी जाँच लीजिए
यह बात अक्सर ग़लत बताई जाती है, इसलिए लोग चूक जाते हैं। मकान मालिक का नाम, पता और PAN तब चाहिए जब साल में आपका दिया हुआ किराया ₹1,00,000 से ज़्यादा हो — यानी लगभग ₹8,333 महीना।
यह आपके HRA दावे पर आधारित नहीं है, और न ही छूट की राशि पर। अगर आपका किराया इस रेखा को पार करता है तो PAN चाहिए, भले ही आपकी छूट उससे कहीं कम बनती हो। मकान मालिक के पास सचमुच PAN न हो तो उनसे इस आशय का हस्ताक्षरित घोषणापत्र लीजिए।
और यह भी देखिए कि आप किस शहर में हैं
इन सबसे अलग, आयकर नियम, 2026 ने उन शहरों की सूची बढ़ा दी है जहाँ HRA की सीमा 40% के बजाय 50% है। पहले चार थे — मुंबई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई। अब आठ हैं, जिनमें बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और अहमदाबाद जुड़े हैं।
इन चार में से किसी में किराये पर रहते हैं तो आपकी छूट इस साल पिछले साल से ज़्यादा बन सकती है, बिना वेतन या किराये में कोई बदलाव किए। बहुत से पेरोल सॉफ़्टवेयर ने अभी यह नहीं पकड़ा है, इसलिए TDS शीट जो मान रही है उसे मान लेने के बजाय अपने आँकड़े ख़ुद जाँच लेना बेहतर है।
क्या तैयार रखें
- जिन महीनों का दावा कर रहे हैं उन सबकी किराया रसीदें, नंबरवार और हस्ताक्षरित
- मकान मालिक का PAN, अगर साल का किराया ₹1,00,000 से ऊपर है
- मकान मालिक से आपका रिश्ता, अगर कोई है
- पे-स्लिप से आपका असली मूल वेतन और DA — आपका CTC नहीं, जिसे ज़्यादातर लोग ग़लती से इस्तेमाल कर लेते हैं
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